Текст песни
हे राजपुत्र, चम्पक-वर्णी, स्वर्ण-भूषित गात
मैं कुटीर की सूखी तरुणी, तप्त भूमि सा पात
तुम्हें निहारूँ दूर से, जैसे चकोर चंदा क
मेरी निर्धन सांसें रटतीं, नाम बस तुम्हारा ह
न मखमल
न मखमल
न मखमल
तुम प्रासाद के उन्नत शिखर, मैं गोधूलि की छाय
तुम्हारे कंठ में मणिकंठा, मेरे तन बस टूटी माय
हृदय में प्रेम का नीर भरा, पर हाथों में रिक्तत
प्रेम की इस याचना में, हे प्रिय! है कैसी विवशत
न मखमली वस्त्र हैं, न रत्नों की चमक मेरे पास
बस निश्छल प्रेम का है, अटूट और गहरा विश्वास
क्या मेरी कुटिया की छाँव में, आओगे तुम कभ
या विधाता ने लिखा है, बस विरह की ही रव
न मखमल
न मखमल
न मखमल
हे राजपुत्र, चम्पक-वर्णी, स्वर्ण-भूषित गात
मैं कुटीर की सूखी तरुणी, तप्त भूमि सा पात
तुम्हें निहारूँ दूर से, जैसे चकोर चंदा क
मेरी निर्धन सांसें रटतीं, नाम बस तुम्हारा ह
न मखमल
न मखमल
न मखमल
न मखमल
न मखमल